क्यों लोग दीवाली और छठ के लिए घर जाने को इतने बेचैन हो जाते हैं?

क्यों लोग दीवाली और छठ के लिए घर जाने को इतने बेचैन हो जाते हैं?

✍️ लेखक – Adarsh Kumar Patel
📅 अक्टूबर 2025
🌐 mansoonclub.blogspot.com


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🏡 घर की याद सबसे बड़ी ताकत होती है

हर साल जब अक्टूबर–नवंबर का महीना आता है, तो पूरे देश में एक ही हलचल शुरू हो जाती है —
"घर कब चलेंगे?"
चाहे मुंबई हो, सूरत, दिल्ली या चेन्नई, हर शहर में लाखों लोग अपने गाँव–घर लौटने की तैयारी में लग जाते हैं।

दीवाली और छठ पूजा सिर्फ त्योहार नहीं हैं, बल्कि यह घर–परिवार, रिश्ते और अपनापन का प्रतीक हैं।
इन्हीं दिनों लोग सबसे ज़्यादा अपने परिवार को मिस करते हैं।
जो पूरे साल काम, मेहनत और संघर्ष में लगे रहते हैं — उन्हें लगता है कि ये दो त्योहार ही वो वक्त हैं जब वो सच में “जी” सकते हैं।


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🚉 क्यों मचती है भीड़ — ट्रेनें, स्टेशन और बेचैनी

हर साल दीवाली और छठ के वक्त, देश के लगभग हर बड़े शहर से यूपी–बिहार की ओर लाखों लोग रवाना होते हैं।
लोकमान्य तिलक टर्मिनस (LTT), सूरत का उधना स्टेशन, दिल्ली जंक्शन, और अहमदाबाद से लेकर पुणे तक हर जगह भीड़ का सैलाब उमड़ पड़ता है।

लोगों की भीड़ का कारण केवल घर जाना नहीं है —
बल्कि वो “माँ के हाथ का खाना”, बच्चों की हँसी, छत पर दीपक, और घाट पर छठ का सूर्योदय देखने की चाह है।

कई मजदूर महीनों की बचत में से टिकट लेते हैं।
कभी–कभी ट्रेन में सीट न मिलने पर जनरल कोच में, और कभी ट्रक या बस में सफर करके भी घर पहुँचना चाहते हैं।
क्योंकि उनके लिए यह सिर्फ एक यात्रा नहीं, बल्कि अपनों से मिलने की तड़प होती है।


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❤️ दीवाली – रोशनी से ज़्यादा अपनापन की तलाश

दीवाली में दीप जलाने से पहले लोग अपने घरों की सफाई करते हैं, नए कपड़े पहनते हैं, और घर में मिठाई बनाते हैं।
लेकिन जो लोग बाहर काम करते हैं, उनके लिए सबसे बड़ी खुशी होती है —
माँ–बाप के साथ दीये जलाना, बच्चों के साथ पटाखे फोड़ना, और परिवार की हँसी सुनना।

शहरों में भले ही बिजली की चमक ज़्यादा हो,
पर गाँव के दीये की रोशनी में जो सुकून है, वो कहीं और नहीं मिलता।


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🌅 छठ पूजा – ममता और आस्था का संगम

छठ पूजा उत्तर भारत के सबसे भावनात्मक त्योहारों में से एक है।
यह सिर्फ व्रत या पूजा नहीं, बल्कि माँ, बहन और पत्नी की श्रद्धा का प्रतीक है।
लोग सैकड़ों किलोमीटर का सफर सिर्फ इसलिए करते हैं ताकि घाट पर अपनी माँ या पत्नी को “अरघ्य” देते देख सकें।

सूरज के सामने folded हाथों के बीच से जब आस्था की किरण झलकती है,
तो हर व्यक्ति को लगता है कि उसकी सारी थकान मिट गई।

यही कारण है कि लोग कहते हैं —

> “छठ के लिए घर पहुँचना मतलब ज़िंदगी में सुकून मिल जाना।”




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🚌 भीड़, थकान और संघर्ष — फिर भी मुस्कान

रेलवे स्टेशन पर धक्का-मुक्की, लंबी कतारें, वेटिंग टिकट, रातभर ठंड में इंतज़ार —
इन सबके बावजूद उनके चेहरों पर मुस्कान होती है।
क्योंकि उन्हें पता है — घर पहुँचते ही सब दर्द मिट जाएगा।

यह भीड़ पागलपन नहीं है, यह इंसानियत और रिश्ते की चाह है।
यह वही भावना है जो भारत को जोड़ती है,
जो बताती है कि हम सब अलग जगह रहते हैं, पर दिल से एक हैं।


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💭 निष्कर्ष

लोग दीवाली और छठ के लिए घर इसलिए पागलपन की हद तक निकल पड़ते हैं,
क्योंकि यह “घर जाने” की नहीं, बल्कि “दिल तक पहुँचने” की यात्रा होती है।

यह त्योहार उन्हें याद दिलाते हैं कि

> “ज़िंदगी चाहे जहाँ भी ले जाए, घर की दाल–रोटी और माँ की ममता सबसे बड़ी दौलत है।”




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📍लेखक: Adarsh Kumar Patel
📧 ब्लॉग: mansoonclub.blogspot.com
📸 स्रोत: यात्रियों के अनुभव, सोशल मीडिया रिपोर्ट, भारतीय रेलवे अवलोकन

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