✍️ लेखक – Adarsh Kumar Patel
🌐 mansoonclub.blogspot.com
📅 अक्टूबर 2025
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🌙 शहर की चकाचौंध में वो सुकून कहाँ...
शहर की बड़ी-बड़ी इमारतों, चमकती लाइटों और भागती ज़िंदगी के बीच,
हर प्रवासी के दिल में एक कोना हमेशा खाली रहता है —
जहाँ बस “घर” बसता है।
जब दीवाली और छठ पूजा पास आते हैं,
तो वही खाली कोना अचानक बोल उठता है —
> “चलो, अब घर चलते हैं... माँ इंतज़ार कर रही होगी।”
यही वो वक़्त होता है जब लाखों लोग अपनी थकान, तकलीफ़, और काम का बोझ सब भूल जाते हैं।
सिर्फ एक सपना रह जाता है — घर की देहरी पार करना।
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🚉 भीड़ नहीं, यह तो प्यार की दौड़ है
रेलवे स्टेशन पर उमड़ती भीड़ को देखकर कोई कहता है “लोग पागल हो गए हैं” —
पर असल में यह पागलपन नहीं, अपनापन है।
वो मजदूर जो पूरे साल किसी के घर बनाता है,
वो ड्राइवर जो दूसरों को मंज़िल तक पहुँचाता है,
वो फैक्ट्री में काम करने वाला इंसान जो अपने बच्चों को फोन पर सिर्फ “हेलो बेटा” कह पाता है —
अब वो खुद अपने घर की ओर दौड़ता है।
उसे न टिकट की परवाह है, न सफर की तकलीफ़ की।
जनरल डिब्बे में लटककर भी जाना पड़े,
तो भी दिल कहता है —
> “कुछ नहीं होता, बस इस बार माँ के हाथ का लड्डू खा लूँ।”
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🕯️ दीवाली – रोशनी से ज़्यादा, दिल का उजाला
शहर में लाखों बल्ब जलते हैं,
पर माँ की रसोई में जब दिया जलता है,
तो वो रोशनी आँखों में नहीं, दिल में उतरती है।
दीवाली का असली मतलब किसी मॉल की लाइटिंग नहीं,
बल्कि वो पल है जब पिता दीया जलाते हैं,
माँ पूजा की थाली में मिठाई रखती हैं,
और बच्चे हँसते हुए कहते हैं —
> “अब तो घर सच में रोशनी से भर गया।”
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🌅 छठ पूजा – आस्था नहीं, भावनाओं का सागर
छठ के घाट पर जब सूरज उगता है,
तो पानी में झुकी माँ के माथे पर चमकता सिंदूर,
हर बेटे-बेटी के दिल को झकझोर देता है।
वो माँ जो पूरे साल फोन पर बस “खाना खा लिया?” कहती है,
अब बिना कुछ कहे, बस अपनी आँखों से आशीर्वाद देती है।
सूर्य देव के आगे हाथ जोड़ते समय उसकी आँखों से जो आँसू गिरते हैं,
वो सिर्फ पूजा नहीं — वो अपने बच्चों के लौट आने की खुशी के आँसू होते हैं।
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🚌 थकान, धूप, धक्का-मुक्की — पर चेहरे पर मुस्कान
रातभर प्लेटफार्म पर इंतज़ार,
बिना सीट के घंटों सफर,
हाथों में बच्चों का सामान, पीठ पर झोला —
फिर भी जब घर की मिट्टी की खुशबू आती है,
तो सारा दर्द गायब हो जाता है।
क्योंकि वो मिट्टी सिर्फ मिट्टी नहीं,
वो बचपन की यादें हैं, माँ की ममता है,
और उस आँगन की छाँव है जहाँ ज़िंदगी ने पहली बार मुस्कुराना सिखाया था।
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💭 क्यों जाते हैं लोग हर कीमत पर?
क्योंकि शहर रोटी देता है,
पर घर प्यार देता है।
क्योंकि नौकरी तनख्वाह देती है,
पर माँ का हाथ पेट नहीं, दिल भर देता है।
क्योंकि शहर में भीड़ है,
पर गाँव में अपना है।
लोग दीवाली और छठ पर घर इसलिए भागते हैं,
क्योंकि सालभर वो मशीन बनकर जीते हैं —
और इन दो त्योहारों में उन्हें याद आता है कि वो इंसान हैं,
किसी के बेटे हैं, किसी की माँ का सपना हैं।
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✨ निष्कर्ष – यह सफर घर का नहीं, दिल का है
जो लोग यह सोचते हैं कि “लोग पागल हो गए हैं घर जाने के लिए,”
उन्हें शायद कभी अकेलेपन में वो फोन कॉल नहीं मिला,
जिसमें माँ ने बस इतना कहा हो —
> “बेटा, इस बार आ जाना... बिना तेरे दीवाली सूनी लगती है।”
वो आँसू, वो हँसी, वो गले लगना —
इसी का नाम है घर लौटना।
और यही वजह है कि जब भी कोई कहता है “चलो घर चलते हैं,”
तो हर थका हुआ इंसान फिर से ज़िंदा हो उठता है।
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📍लेखक: Adarsh Kumar Patel
📧 ब्लॉग: mansoonclub.blogspot.com
📸 भावनाओं का स्रोत: दिल से निकले शब्द, यात्रियों की आँखों में दिखती उम्मीद

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